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A Tribute to Kuldeep Nayar

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वतन की रेत, मुझे एड़ियां रगड़ने दे मुझे यकीन है, पानी यहीं से निकलेगा किसी के खोने के बाद ही उसके कर्मों का अच्छे से मूल्यांकन होता है और तब पता चलता है कि हमने क्या खोया है। अपने जीवन के 70 साल पत्रकारिता को देने वाले कुलदीप नैयर ऐसी ही शख्सियत थे। पत्रकारिता के अलावा एक मानवाधिकार कार्यकर्ता, अभिव्यक्ति की आजादी के योद्धा और भारत-पाकिस्तान के शांतिपूर्ण संबंधों के हिमायती के रुप में उन्हें हमेशा याद किया जायेगा। भारतवर्ष में शायद ही किसी अन्य लेखक को पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु से लेकर वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द मोदी पर लिखने का सौभाग्य मिला हो। हमारे लिए वो अगर विरासत में कुछ छोड़ के गए हैं तो बस अपना जुझारुपन। भारत-पाक बटवारे की टीस हमेशा से उनके अंदर थी। इसी वजह से हरसाल 14-15 अगस्त को बागा बॉर्डर पर दिया जलाकर दोनों देशों में दोस्ती के लिए कामना करते थे। हांलाकि तबीयत बिगड़ने के बाद उनका ये सिलसिला कम हो गया था। आपातकाल के दौरान भी उनका जुझारुपन नहीं थमा, भले ही अपनी लेखनी के चलते उन्हें जेल जाना पड़ा हो। अभिव्यक्ति की आजादी के लिए एक योद्धा के रुप में उन्होंने भारतीय प...