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Showing posts from March, 2020

तो आपको कौन-से गेम्स पसंद है ?

तो आपको कौन-से गेम्स पसंद है ?  शुरुआत एक कहावत से करते हैं,    वो कहते है ना कि अति हर चीज की बुरी होती है। बात करते हैं उन नौजवानों की, जिन्हें हम अक्सर ‘ देश का भविष्य ’ कहकर बुलाते हैं। वह आनलाईन गेम्स में इस हद तक खो गया है कि उसे खाने-पीने तक की चिंता नहीं और आउटडोर गेम्स को तो मानों भुल ही गया है। आउटडोर गेम्स हमारे शारीरिक विकास के साथ-साथ दिमागी विकास में भी सहायक होती हैं। ऐसी बात नहीं है कि आनलाईन गेम्स के फायदे नही हैं। इनके भी बहुत से फायदे हैं अगर इन्हें सही से इस्तेमाल किया जाये तो | इसके कुछ तथ्य इस प्रकार हैं--- v   रोज़ाना कुछ देर तक वीडियो गेम खेलने से बच्चों के विकास पर अच्छा असर हो सकता है। ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी की एक शोध के नतीजे इसी ओर इशारा करते हैं। v   मनोवैज्ञानिक डॉक्टर एंड्रूय प्रज़ाइबाइल्स्की ने ब्रिटेन के पाँच हजार बच्चों पर ये शोध किया। शोध में शामिल किए गए बच्चे 10 से 15 साल की उम्र के थे। इनमें से तीन चौथाई बच्चों ने कहा कि वे हर रोज वीडियो गेम खेलते हैं। v   लेकिन शोध के मुताबिक वे बच्चे जो तीन घं...

'आओ कंधे से कंधा मारकर चलें'

'आओ कंधे से कंधा मारकर चलें' सचमुच में केयू कैंपस के रिवर साइड पार्क में बनी छोटी-सी पगडंडी शाम के वक्त कुछ 'विलक्षण प्रतिभा के धनी' लड़कों के लिए एक विशेष प्रतियोगिता का ट्रैक बन जाती है, जिसमें यह देखा जाता है कि कौन-सा लड़का कितनी लड़कियों के कंधे पर टक्कर मारकर आगे निकलता है। इसके पश्चात किसी 'गैर-पंजीकृत समूह' द्वारा उस 'होनहार लड़के' की पीठ थपथपाकर इनाम स्वरूप शाबासी दी जाती है। लड़कियों को क्या पता कि वो लड़के कितनी 'अद्भुत कला' के धनी हैं, वो तो सहम जाती हैं। हो सकता है कि इन लड़कों को घर पर कोई टक्कर मारने वाला ना मिला हो और विश्वविद्यालय में ही इनको अपनी इस 'विलक्षण प्रतिभा' को प्रस्तुत करने का सुनहरा अवसर मिला हो। अगर इन लड़कों के घरवाले भी समय रहते इनकी इस प्रतिभा से अवगत हो जाते तो ये वहीं डंडों और जूते से पुरस्कृत हो जाते या फिर इनके शानदार प्रदर्शन के लिए इनको कोई अच्छा-सा 'प्लेटफॉर्म' मुहैया हो जाता। फिलहाल तो अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक एसोसिएशन से सिर्फ एक निवेदन ही किया जा सकता है कि वह अपने आगामी ओलंपिक खेलों मे...

एक ही तो चैप्टर है काम का

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आप कितने अच्छे हैं। हर बार आपके लिए आना पड़ता है। सुना है ज्यादा समझदार हो गए हो। एक-तरफा ही सेंचुरी मार लोगे हैना। मैं खुद भी नहीं जानता कि किस हद तक मैंने अपने आपको यहां तक ला दिया है। कई बार तो लगता है कि मैं ही हूं यहाँ अकेला, कोई साथ नहीं है। जिससे उम्मीद थी साथ होने की, वो पता नहीं कहाँ है। शायद भीड़ में रह गया है कहीं। गलती मेरी ही होगी, मैंने कस्स के हाथ नहीं पकड़ा या हो सकता कि जरूरत से ज्यादा पकड़ लिया हो और वो बुरा मान गया हो। कभी-कभी लगता है कि गलत कर लिया मैंने। इतना कस्स के नहीं पकड़ना चाहिए था कि पता चले उसका हाथ ही मेरा सहारा है और जब वो छूटे तो धड़ाम से गिरना पड़े। पर बता भी तो सकता था वो।  अब 'मजा' आ रहा होगा खूब हैना। इतना ज्यादा कि जब तक अंदर जो है वो बाहर नहीं उलट देता तब तक ये 'मजा' आता ही रहेगा।  भविष्य तो अब देखा नहीं जा सकता। पर भगवान को एक हेल्पलाइन तो देनी चाहिए-सामने वाले के अंदर को समझ सके इतनी तो कम से कम। या फिर माता-पिता को परवरिश के टाइम प्रेम-प्यार का चैप्टर भी शामिल करना चाहिए। ताकि 'हाथ पकड़ने' से पहले...

एक बात कहनी थी, आप सुनोगे...

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बड़े दिनों से एक शिकायत थी खुद से कि जो अंदर है वो सारा बाहर उलट दूँ। अब पता नहीं आप उससे कितना RELATE कर पाएंगे। पर इतना जरूर है कि यहाँ से खाली हाथ नहीं जाओगे।  आपने भी कभी न कभी किसी खाश चीज़ से जुड़ाव, लगाव या जो आप ठीक समझो वो महसूस किया होगा और जब सब-कुछ आपकी इच्छा या सोच के अनुकूल न हो तो दुःख भी हुआ होगा, होता होगा। आखिर क्या जरूरत है हमें किसी से इतनी ज्यादा उम्मीदें रखने की, अपेक्षाएं रखने की। जबकि हर कोई अपने विचारों, इरादों और सोच के लिए स्वतंत्र है।  आपकी हर बात को मानने वाला, समझने वाला 'पागल' भी नहीं होता और फिर एक तरफा इतना ज्यादा लगाव रखने वाला 'समझदार' भी तो नहीं होता।  एक तरफा लगाव या जुड़ाव में हम कभी-कभी इतनी ज्यादा अपेक्षाएं और उम्मीदें पाल बैठते हैं कि जब वो टूटती हैं तो आप भी टूटने लगते हो। ऐसे में ना गलती आपकी होती है और सामने वाले की तो क्या होगी। बस देर होने से पहले खुद को संभाल जरूर लें। वरना 'टूटना' किसी के लिए आधी मौत से कम नहीं होता।   जब लगाव दोनों-तरफा हो तब की बात और है...