Chalte....Chalte....

चलते चलते इतनी दूर आ गए  पता नहीं चप्पल कहाँ उतारी थी ,

हमको तो बस चलते जाना था
जैसा माहौल मिला उसमें ढलते जाना था
देखने को दूनिया सारी थी
चलते चलते इतनी दूर आ गए कि पता नहीं चप्पल  कहाँ उतारी थी

पहले तो...... किताबों से लव था, फैशन से भी दूरी थी
बाद में .......ऐसा जकड़ा इसकी-किसकी बेड़ियों ने फैशन करना मज़बूरी थी

बस ऐसे ही मुरझा गए वो फूल जिनकी खिलती कभी क्यारी थी
चलते चलते इतनी दूर आ गए कि पता नहीं चप्पल कहाँ उतारी थी

अलग-अलग नज़रों से देखी गई दुनिया में
बात-बात करती, मुलाकात करती दुनिया में
स्वार्थी हो जाने की अलग ही खुमारी थी

चलते चलते  ..... इतनी दूर...

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