आप भी तो हरियाणा से हो...
नमस्कार तुरंत के हरियाणा में आपका स्वागत है। चौंकिये मत तुरंत कहने का मतलब यहां प्रगति या विकास की गतिशीलता से नहीं है, बल्कि हम सबके आस-पास जो तुरंत में घटित हो रहा है उससे है। आप टीवी देखते हो, स्मार्ट फोन जैसे माध्यमों का प्रयोग करते हो उस समय बड़े मजे से चटकारे लेकर इन माध्यमों पर प्यार-महोब्बत जैसी चीज़ों को देखते हो। पर उसको रियलिटी से या वास्तविकता से जोड़ने से डरते हो। ये हरियाणा की सच्चाई है।
हमको बस सिनेमा-परदे पर दिखाया गया प्रेम ही अच्छा लगता है। हमारी आम जीवन शैली में ऐसे प्रेम की दूर-दूर तक कोई मात्रा नहीं है। अगर किसी ने 'ऐसा प्रेम' करने की हिम्मत कर भी ली तो हमारे खाप पंचायतों के तथाकथित उच्च आदर्श रोड़ा बन जाते हैं। यहां ऐसा बिलकुल नहीं है कि पंचायत हमेशा सही ही हो और ऐसा भी नहीं कि ये हमेशा गलत हो। मुख्य समस्या पीढीयों (GENERATIONS) के टकराव की है। एक पीढ़ी दूसरी पीढ़ी के विचारों,धारणाओं को समझने में विफल हो रही है। ये कहना बिलकुल गलत नहीं है कि जो वर्ग पंचायतों में बैठता है वो उन्हीं तथाकथित आदर्शों-रीतियों का पालन करता है जो आज से सौ या दो सौ साल पहले हुआ करते थे।
ठहरे हुये पानी से भी बदबू आने लगती है। ठीक कुदरत का यही नियम इन रूढ़िवादी परम्पराओं पर भी लागु होता है।
सभ्य समाज के निर्माण में अगर पंचायतों को भूमिका अदा करनी है तो उनको अपनी परम्पराओं में जरूरत के हिसाब से और समय के अनुसार परिवर्तन लाना होगा। जरूरी नहीं कि जमाने को देखने के लिए एक ही तरह का चश्मा लगाया जाये। जरूरत के हिसाब से कई बार नजर और नजरिया दोनों बदलने पड़ते हैं।
जनरेशन गैप की सोच यहां पे भी लागु होती है। एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी के गैप को समझने के लिए जरूरी है कि बुजुर्गों की 'रूढ़ता' वाली सोच को त्यागकर नई पीढ़ी की जीवन शैली में झांककर देखा जाये। इस जनरेशन के टकराव को कम करने के लिए किसी न किसी को तो पहल करनी ही होगी।
हमको बस सिनेमा-परदे पर दिखाया गया प्रेम ही अच्छा लगता है। हमारी आम जीवन शैली में ऐसे प्रेम की दूर-दूर तक कोई मात्रा नहीं है। अगर किसी ने 'ऐसा प्रेम' करने की हिम्मत कर भी ली तो हमारे खाप पंचायतों के तथाकथित उच्च आदर्श रोड़ा बन जाते हैं। यहां ऐसा बिलकुल नहीं है कि पंचायत हमेशा सही ही हो और ऐसा भी नहीं कि ये हमेशा गलत हो। मुख्य समस्या पीढीयों (GENERATIONS) के टकराव की है। एक पीढ़ी दूसरी पीढ़ी के विचारों,धारणाओं को समझने में विफल हो रही है। ये कहना बिलकुल गलत नहीं है कि जो वर्ग पंचायतों में बैठता है वो उन्हीं तथाकथित आदर्शों-रीतियों का पालन करता है जो आज से सौ या दो सौ साल पहले हुआ करते थे।
ठहरे हुये पानी से भी बदबू आने लगती है। ठीक कुदरत का यही नियम इन रूढ़िवादी परम्पराओं पर भी लागु होता है।
सभ्य समाज के निर्माण में अगर पंचायतों को भूमिका अदा करनी है तो उनको अपनी परम्पराओं में जरूरत के हिसाब से और समय के अनुसार परिवर्तन लाना होगा। जरूरी नहीं कि जमाने को देखने के लिए एक ही तरह का चश्मा लगाया जाये। जरूरत के हिसाब से कई बार नजर और नजरिया दोनों बदलने पड़ते हैं।
जनरेशन गैप की सोच यहां पे भी लागु होती है। एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी के गैप को समझने के लिए जरूरी है कि बुजुर्गों की 'रूढ़ता' वाली सोच को त्यागकर नई पीढ़ी की जीवन शैली में झांककर देखा जाये। इस जनरेशन के टकराव को कम करने के लिए किसी न किसी को तो पहल करनी ही होगी।
Comments
Post a Comment