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भले ही कुछ राजनीतिक दलों को केंद्र सरकार द्वारा तीन तलाक पर अध्यादेश लाकर उसे दंडनीय अपराध बनाना जल्दबाजी लगा हो। कुछ को यह न्याय और समाज सुधार की बजाय राजनीतिक फैसला ज्यादा लगा होगा। पंरतु हमें सुप्रीम कोर्ट के दिए गए फैसले पर भी गौर करना चाहिए। शीर्ष कोर्ट ने स्वयं तलाक-ए-बिद्दत को अवैद्य घोषित किया था और केंद्र सरकार को इस बारे में कानून बनाने का सुझाव दिया था। केंद्र सरकार कानून बनाकर लोकसभा में इसे पारित करवा चुकी थी परंतु राज्यसभा में ये बिल अटक गया। इसी कारण सरकार ने अध्यादेश को ही अंतिम विकल्प मानकर तीन तलाक को दंडनीय अपराध बना दिया है। अब देखने वाली बात इसमें ये है कि जिस समाज को ध्यान में रखकर यह कानून बना है वह उसे किस तरह से लेता है।
स्वच्छ भारत अभियान को चार साल पूरे होने वाले हैं। इन चार सालों में स्वच्छता को लेकर देश में क्या-क्या हुआ ये इन सब बातों पर मंथन का समय है। ये सही बात है कि स्वच्छता सबसे पहले हमारे खुद के व्यवहार से जुड़ी हुई है। अगर हमें हमारा घर साफ-सुथरा रखना अच्छा लगता है तो शहर या देश क्यों नहीं। जितनी आसानी से हम सड़क पर या पार्क में कचरा डाल देते हैं क्या वैसा ही बर्ताव हमारा अपने घर पर भी होता है। ये सवाल तो चलो खुद के आचरण से जुड़ा है। मगर सवाल उन वादों पर भी खड़े होते हैं जो स्वच्छता के नाम पर पिछले चार सालों से किये गए। 2 अक्टूबर आते ही हर नेता के हाथ में झाडू होती है। मगर साल भर तक उसकी गैर-हाजिरी में उस इलाके में सफाई हुई भी या नहीं वो जाकर नहीं देखता। सफाई के लिए अगर महज औपचारिकता ही निभानी है तो इस अभियान की क्या जरूरत है। स्वच्छ भारत अभियान को अगर कोई सफल बना सकता है तो वो इस देश के सफाई कर्मचारी हैं जिनको ही सही मायनो में इस अभियान का ब्रांड-अम्बेसडर बना देना चाहिये।
ये सही है कि जितनी आजादी पुरुषों को है उतनी ही महिलाओं को भी होनी चाहिए। इसीलिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा आइपीसी की धारा 497 को निरस्त करना एक स्वागत-योग्य फैसला है। जिस तरह तरह एक शादीशुदा पुरुष अपनी पत्नी के अलावा किसी और के साथ शारीरिक संबंध बनाता है ठीक वैसे ही एक पत्नी को भी ऐसा करने की आजादी है। मगर यहां गौर करने वाली बात है कि पति-पत्नी का रिश्ता दोनों के आपसी भरोसे पर टिका होता है। ये भरोसा ही है जो दोनों के रिश्ते की पवित्रता को बनाए रखता है। जहाँ 'पति- पत्नी और वो' की गुंजाईश है वहां रिश्ता नहीं टिकता। क्योंकि यहाँ तीसरा पक्ष हमेशा रिश्ते में विश्वाश को कमजोर करता है। इसीलिए चाहे महिला हो या पुरुष गृहस्थ जीवन से बाहर बनाया गया शारीरिक संबंध भले ही कानून की नजर में अपराध न हो पर नैतिक दृष्टि से तो गलत ही है। सुप्रीम कोर्ट ने भी अपने फैसले के साथ ये कहा है कि व्याभिचार को विवाह खत्म करने या तलाक का आधार बनाया जा सकता है।
असहनशीलता को धर्म के चश्मे से देखना एकदम गलत है। यह एक तरह की सोच है जो हमारे समाज को पतन की ओर लेकर जा रही है। बीते दिनों रेवाड़ी के एक गाँव में एक किसान की कुछ स्थानीय लोगों द्वारा पीट-पीट कर हत्या कर देना और नारनौल में एक चौथी कक्षा के छात्र की कहासुनी का बदला लेने के लिए पड़ोसी द्वारा गला रेतकर हत्या करना- ये सब यही दिखाता है कि हममें कितनी सहनशीलता बची है। ये कौन सा समाज हम बना रहे हैं जहाँ एक-दूसरे तक को देखकर हम खुश नहीं हैं ? क्या ऐसे समाज में हमारी आने वाली पीढ़ीयां सुरक्षित रहेंगी ? विचार हमको करना है क्योंकि हर बार सरकार और प्रशासन से ही उम्मीद नहीं रखनी चाहिए। हमको कैसा समाज चाहिए यह हमारी सोच पर निर्भर करेगा।
स्वच्छ भारत अभियान को चार साल पूरे होने वाले हैं। इन चार सालों में स्वच्छता को लेकर देश में क्या-क्या हुआ ये इन सब बातों पर मंथन का समय है। ये सही बात है कि स्वच्छता सबसे पहले हमारे खुद के व्यवहार से जुड़ी हुई है। अगर हमें हमारा घर साफ-सुथरा रखना अच्छा लगता है तो शहर या देश क्यों नहीं। जितनी आसानी से हम सड़क पर या पार्क में कचरा डाल देते हैं क्या वैसा ही बर्ताव हमारा अपने घर पर भी होता है। ये सवाल तो चलो खुद के आचरण से जुड़ा है। मगर सवाल उन वादों पर भी खड़े होते हैं जो स्वच्छता के नाम पर पिछले चार सालों से किये गए। 2 अक्टूबर आते ही हर नेता के हाथ में झाडू होती है। मगर साल भर तक उसकी गैर-हाजिरी में उस इलाके में सफाई हुई भी या नहीं वो जाकर नहीं देखता। सफाई के लिए अगर महज औपचारिकता ही निभानी है तो इस अभियान की क्या जरूरत है। स्वच्छ भारत अभियान को अगर कोई सफल बना सकता है तो वो इस देश के सफाई कर्मचारी हैं जिनको ही सही मायनो में इस अभियान का ब्रांड-अम्बेसडर बना देना चाहिये।
ये सही है कि जितनी आजादी पुरुषों को है उतनी ही महिलाओं को भी होनी चाहिए। इसीलिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा आइपीसी की धारा 497 को निरस्त करना एक स्वागत-योग्य फैसला है। जिस तरह तरह एक शादीशुदा पुरुष अपनी पत्नी के अलावा किसी और के साथ शारीरिक संबंध बनाता है ठीक वैसे ही एक पत्नी को भी ऐसा करने की आजादी है। मगर यहां गौर करने वाली बात है कि पति-पत्नी का रिश्ता दोनों के आपसी भरोसे पर टिका होता है। ये भरोसा ही है जो दोनों के रिश्ते की पवित्रता को बनाए रखता है। जहाँ 'पति- पत्नी और वो' की गुंजाईश है वहां रिश्ता नहीं टिकता। क्योंकि यहाँ तीसरा पक्ष हमेशा रिश्ते में विश्वाश को कमजोर करता है। इसीलिए चाहे महिला हो या पुरुष गृहस्थ जीवन से बाहर बनाया गया शारीरिक संबंध भले ही कानून की नजर में अपराध न हो पर नैतिक दृष्टि से तो गलत ही है। सुप्रीम कोर्ट ने भी अपने फैसले के साथ ये कहा है कि व्याभिचार को विवाह खत्म करने या तलाक का आधार बनाया जा सकता है।
असहनशीलता को धर्म के चश्मे से देखना एकदम गलत है। यह एक तरह की सोच है जो हमारे समाज को पतन की ओर लेकर जा रही है। बीते दिनों रेवाड़ी के एक गाँव में एक किसान की कुछ स्थानीय लोगों द्वारा पीट-पीट कर हत्या कर देना और नारनौल में एक चौथी कक्षा के छात्र की कहासुनी का बदला लेने के लिए पड़ोसी द्वारा गला रेतकर हत्या करना- ये सब यही दिखाता है कि हममें कितनी सहनशीलता बची है। ये कौन सा समाज हम बना रहे हैं जहाँ एक-दूसरे तक को देखकर हम खुश नहीं हैं ? क्या ऐसे समाज में हमारी आने वाली पीढ़ीयां सुरक्षित रहेंगी ? विचार हमको करना है क्योंकि हर बार सरकार और प्रशासन से ही उम्मीद नहीं रखनी चाहिए। हमको कैसा समाज चाहिए यह हमारी सोच पर निर्भर करेगा।
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