'आओ कंधे से कंधा मारकर चलें'

'आओ कंधे से कंधा मारकर चलें'

सचमुच में केयू कैंपस के रिवर साइड पार्क में बनी छोटी-सी पगडंडी शाम के वक्त कुछ 'विलक्षण प्रतिभा के धनी' लड़कों के लिए एक विशेष प्रतियोगिता का ट्रैक बन जाती है, जिसमें यह देखा जाता है कि कौन-सा लड़का कितनी लड़कियों के कंधे पर टक्कर मारकर आगे निकलता है। इसके पश्चात किसी 'गैर-पंजीकृत समूह' द्वारा उस 'होनहार लड़के' की पीठ थपथपाकर इनाम स्वरूप शाबासी दी जाती है। लड़कियों को क्या पता कि वो लड़के कितनी 'अद्भुत कला' के धनी हैं, वो तो सहम जाती हैं। हो सकता है कि इन लड़कों को घर पर कोई टक्कर मारने वाला ना मिला हो और विश्वविद्यालय में ही इनको अपनी इस 'विलक्षण प्रतिभा' को प्रस्तुत करने का सुनहरा अवसर मिला हो। अगर इन लड़कों के घरवाले भी समय रहते इनकी इस प्रतिभा से अवगत हो जाते तो ये वहीं डंडों और जूते से पुरस्कृत हो जाते या फिर इनके शानदार प्रदर्शन के लिए इनको कोई अच्छा-सा 'प्लेटफॉर्म' मुहैया हो जाता। फिलहाल तो अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक एसोसिएशन से सिर्फ एक निवेदन ही किया जा सकता है कि वह अपने आगामी ओलंपिक खेलों में इस विशेष विधा को भी स्थान दे, नहीं तो यह शानदार प्रतिभा समय के साथ ही विलुप्त हो जाएगी। इससे अच्छा तो यही होगा कि इन लड़कों के घरवालों को ही इस 'विलक्षण प्रतिभा' के दर्शन करा दिए जाएं, जिससे विश्वविद्यालय की अपनी जिम्मेदारी भी खत्म हो जाएगी और उनको भी एक शानदार  'प्लेटफॉर्म' मिल जाएगा।

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