यह भी कोई कहने की बात थी भला
लिखा तो हर चीज पर जा सकता है, मगर दिक्कत तब होती है जब किसी ऐसे विषय पर लिखा जाए जिस पर आप खुलकर चर्चा भी ना कर सकें।
राजस्थान का एक जिला है बाँसवाड़ा, वहाँ की एक घटना ने मुझे आहत कर दिया। घटना में दो महीने की गर्भवती युवती का उसके होने वाले मंगेतर के सामने 12 घंटे में 11 बार रेप हुआ। आरोपियों ने मंगेतर को पहले ही पेड़ के साथ बाँध दिया था इसीलिए वो कुछ ना कर सका। आरोपी युवक और युवती को जंगल की झाड़ियों में फैंककर चले गए। घटना के अगले दिन चूंकि मंगेतर की आँखों के सामने ये घटना हुई थी इसीलिए वो आहत था और उसने आत्महत्या कर ली। ये एक घटना है अब दूसरी घटना सुनिए।
एक दम्पति जोड़ा बाइक पर अपनी 2 साल की बच्ची के साथ बरवाला से हिसार जा रहा था तभी उनकी बाइक खराब हो जाती है। पति बच्ची को गोद में ले लेता है और दोनों पति-पत्नी पैदल चलने लगते हैं। पति चलते-चलते आगे निकल जाता है और पत्नी थोड़ा पीछे रह जाती है। इसी दौरान पीछे से सड़क पर एक ट्रंक आता है जिसमें बैठा चालक और उसका सहकर्मी महिला को पकड़ कर जबरदस्ती ट्रंक में बैठा लेते हैं और फिर उसे अपनी हवस की हैवानियत का शिकार बनाते हैं। पति काफी दूर तक चलने के बाद पीछे देखता है जहाँ उसको अपनी पत्नी नहीं मिलती। आरोपी घटना को अंजाम देकर महिला को किसी खेत में फैंक चले जाते हैं।
राजस्थान का एक जिला है बाँसवाड़ा, वहाँ की एक घटना ने मुझे आहत कर दिया। घटना में दो महीने की गर्भवती युवती का उसके होने वाले मंगेतर के सामने 12 घंटे में 11 बार रेप हुआ। आरोपियों ने मंगेतर को पहले ही पेड़ के साथ बाँध दिया था इसीलिए वो कुछ ना कर सका। आरोपी युवक और युवती को जंगल की झाड़ियों में फैंककर चले गए। घटना के अगले दिन चूंकि मंगेतर की आँखों के सामने ये घटना हुई थी इसीलिए वो आहत था और उसने आत्महत्या कर ली। ये एक घटना है अब दूसरी घटना सुनिए।
एक दम्पति जोड़ा बाइक पर अपनी 2 साल की बच्ची के साथ बरवाला से हिसार जा रहा था तभी उनकी बाइक खराब हो जाती है। पति बच्ची को गोद में ले लेता है और दोनों पति-पत्नी पैदल चलने लगते हैं। पति चलते-चलते आगे निकल जाता है और पत्नी थोड़ा पीछे रह जाती है। इसी दौरान पीछे से सड़क पर एक ट्रंक आता है जिसमें बैठा चालक और उसका सहकर्मी महिला को पकड़ कर जबरदस्ती ट्रंक में बैठा लेते हैं और फिर उसे अपनी हवस की हैवानियत का शिकार बनाते हैं। पति काफी दूर तक चलने के बाद पीछे देखता है जहाँ उसको अपनी पत्नी नहीं मिलती। आरोपी घटना को अंजाम देकर महिला को किसी खेत में फैंक चले जाते हैं।
उपरोक्त घटनाओं को इतना विस्तार से बताने का यही मकसद था कि अगर हम ऐसी किसी घटना का हिस्सा होते तो क्या करते। क्योंकि जब तक हम किसी घटना को खुद से जोड़कर नहीं देखते तब तक हम उसको हल्के में ही लेते हैं। एनसीआरबी की रिपोर्ट का भी जिक्र करना जरूरी नहीं जो यह बताती है कि भारत में हर घंटे 4 महिलायें दरिंदगी का शिकार होती हैं। हम ये क्यूँ भूल रहे हैं कि ये मानसिकता हमारे भी समाज का हिस्सा बन रही है और हम चुपचाप मुकदर्शक बनकर देख रहें हैं। ऐसी क्या चीज है जो किसी आदमी को अपनी हवस को शान्त करने के लिए इतना मजबुर कर देती है कि जिसके बाद वो किसी औरत, लड़की या बच्ची पर जुल्म ढाता है। कानून में कयूँ नहीं कोई ऐसा प्रावधान जोड़ा जाता कि इस तरह के अपराध को अंजाम देने वाले व्यक्ति के शरीर का वो हिस्सा ही काट दिया जाए जो उसको ऐसा करने के लिए प्रेरित करता है। फ़िर वो मानव अधिकारों की दुहाई याद आ जाएगी।
चलो छोड़ो, दरअसल हम अबतक ये मानकर बैठे हैं कि इस समस्या का हल केवल और केवल नये और सख्त कानून बनाने से ही होगा। मगर कानून का डर भी एक सीमा तक ही ठीक है और यह इस समस्या का पूर्ण ईलाज भी नहीं है। असल में ऐसे अपराधों के जड़ में वो 'कामुकता रुपी मानसिकता' है जो हवस को शान्त करने के लिए किसी को भी अपना शिकार बना लेती है। अगर प्रेम, कामुकता, हवस और सेक्स जैसी चीजों के बारे में एक सकारात्मक और स्पष्ट मानसिकता तैयार की जाए तो शायद ऐसे अपराधों को अच्छे से टैकल किया जा सकता है।
फिर क्यूँ नहीं एजुकेशन सिस्टम और हर उस संस्था या संस्थान में जहाँ पर औरत और मर्द साथ काम करते हैं, पढ़ते हैं, उसके अंदर सेक्स एजुकेशन और कामुकता व हवस जैसी चीजों की सीमाओं पर बात की जाए और जागरूक करके समझाया जाए। ऐसा काम करने के लिए किसी अंक आधारित शिक्षा या सिर्फ अंकों के लिए पढ़ाने वाले 'कमबख्त' अध्यापकों की नहीं बल्कि ऐसे लोगों की जरूरत है जो व्यक्ति को प्रेम और हवस के बीच के अंतर और कामुकता की सीमा को अच्छे से दिमाग में बैठा सकें। और ये काम जितना जल्दी हो सके उतना जल्दी किया जाना चाहिए। आमतौर पर कोई सरकारी छुट्टी करनी होती है तो उसकी सूचना तुरंत उस विभाग या अलग-अलग संस्थानों में पहुँच जाती है, पर ऐसे कामों को करने के लिए हमारी सरकारों को समय चाहिए और वो भी 10-15-20-30 सालों का। तब तक इंतजार कीजिए एनसीआरबी के आंकड़ों के बढ़ने का या उन्हें छिपाने का।
साभार अजय


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