पुस्तक
समीक्षा
हाल ही
में एक पुस्तक पढ़ी- भारतीय इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, जिसके
लेखक हैं डॉ. देवव्रत। डॉ. देवव्रत ने जनसंचार विषय में एम.ए. किया हुआ है और पी एच
डी के साथ-साथ रेडियो एवं टेलीविजन पत्रकारिता में भी इन्होंने डिप्लोमा किया हुआ
है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया विषय पर इनके अनेक लेख व शोध-पत्र प्रकाशित हो चुके हैं।
प्रभात
प्रकाशन, दिल्ली
में छपी इनकी पुस्तक भारतीय इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का पहला संस्करण साल 2007 में आया।
वैसे तो आधुनिक इतिहास का वर्णन करना सबसे जटिल काम होता है क्योंकि इनकी घटनाओं
के तथ्यों में परिवर्तन आता रहता है। किंतु डॉ. देवव्रत ने बहुत ही सरल शब्दों में
इस जटिल कार्य को भी पुरा कर दिया है। पुस्तक में भारत के रेडियो, टेलीविजन और वेब मीडिया के
विकास को राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और साँस्कृतिक
विकास से जोड़कर बताया गया है,
जोकि सत्य प्रतीत होता है। पुस्तक में कई ऐसी ऐसी घटनाओं का जिक्र है
जो वाकई में उस जमाने की यादें ताजा कराती हैं। घटनाओं को पढ़कर आँखों के सामने
दृश्य खड़ा होता है। पुस्तक कुछ पुराने टीवी धारावाहिकों की याद भी ताजा करती है
जैसे रामायण, शक्तिमान, कहानी घर-घर की आदि की याद
आज भी हमारे जहन में है। दूरदर्शन के इतिहास और निजी टीवी चैनलों के आगमन को
रोमांचक ढंग से बताया गया है। कंप्यूटर क्रांति और वेब मीडिया के विकास का वर्णन
एकदम संक्षिप्त और सरल है।
हालांकि
यह पुस्तक कोई उपन्यास या कहानी नहीं है, मगर फिर भी पाठकों को जोड़ने और रोमांच पैदा करने में लेखक की लेखनी
कारगर साबित हुई है। शायद एक कारण यह भी हो सकता है कि लेखक ने तथ्यों का वर्णन
करने के साथ-साथ उनसे जुड़ी घटनाओं को भी पुस्तक में प्रमुखता से जगह दी है।
जैसा कि
शुरुआत में ही मैंने कहा था कि आधुनिक इतिहास का वर्णन सबसे जटिल काम होता है।
परिणाम और आँकडे बदलते रहते हैं। यही कमी इस पुस्तक मे खलती है। अगर इस पुस्तक के
नवींन संस्करण में इन बदलावों को शामिल किया जाता है तो पुस्तक की रोचकता ऐसे ही
बनी रहेगी। पुस्तक के नवीन संस्करण की आशा के साथ समीक्षा को यहीं विराम देते हैं।
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