हरियाणवी संस्कृति को सहेजने वाली रत्नावली : एक यात्रा
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हरियाणवी संस्कृति की विरासत को संजोकर रखने में रत्नावली महोत्सव का खासा योगदान रहा है। ऐसे में कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी के युवा और संस्कृतिक विभाग के सभी निदेशकों को याद करना जरूरी हो जाता है जो इस कारवां को यहाँ तक सहेज कर लाये हैं।
डॉ हिम्मत सिंह सिन्हा जोकि 1967 से 1974 तक इस विभाग के निदेशक रहे हैं, इनके समय में हर साल रत्नावली महोत्सव मनाया जाता था, मगर उस समय रत्नावली में महज दो या तीन विधाओं का ही मंचन होता था और यह सिर्फ विश्वविद्यालय स्तर पर ही मनाई जाती थी।
अनूप लाठर जी 1985 से लेकर 2014 तक युवा और संस्कृतिक विभाग के निदेशक रहे। इनके निर्देशन में ही रत्नावली राज्य स्तरीय महोत्सव के रूप में मनाया जाने लगा। विधाओं की संख्या भी दो या तीन से बढ़ाकर 27 कर दी गई। पहले हरियाणा दिवस के रुप में ही मनाई जाने वाली रत्नावली को आज का 'रत्नवली' नाम लाठर जी द्वारा ही दिया गया है।
महासिंह पुनिया को 2014 से 2015 तक इस विभाग में निदेशक के रुप में अपनी सेवा देने का मौका मिला। इन्होंने रत्नावली को मॉडर्न बनाने में अहम योगदान दिया। इन्होंने रत्नावली में कई ऐसी विधाओं को जोड़ा कि रत्नावली हर युवा की जुबान पर चढ़ गई। रत्नावली में फैशन शो और 'सेल्फी विद हरियाणवी' लाने का आइडिया इन्हीं का था। जो रत्नावली यूनिवर्सिटी के ऑडिटोरियम हॉल तक सीमित थी उसको खुला मंच और रिचुअलस को बाहर के एग्जिबीशन तक लाने में इन्हीं का मुख्य योगदान रहा।
डॉ सी डी एस कौशल जी 2015 से 2018 तक यहाँ निदेशक रहे। इन्होंने रत्नावली की परम्परा को बिना किसी खास बड़े परिवर्तन के ऐसे ही जारी रखा। इनका मानना था कि हरियाणवी संस्कृति को युवाओं के बीच उसी रुप में परोसा जाए जैसी वो हमें विरासत में मिली है।
प्रो. तेजेन्द्र शर्मा जी 2018 से लेकर अभी तक यहाँ के निदेशक हैं। इन्होंने एक तरह से रत्नावली महोत्सव को डिजिटल और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म मुहैया करवाने में अहम भूमिका निभाई है। आज रत्नावली महोत्सव की एप्लिकेशन प्ले स्टोर से डाउनलोड की जा सकती है। वहाँ उसके कार्यक्रम को लाइव देखा जा सकता है।
कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी के युवा और संस्कृतिक विभाग के निदेशकों में डॉ रमेश शर्मा, डॉ पी के कपूर और डॉ होशियार सिंह मलिक जैसे नामों का भी रत्नावली जैसी सांस्कृतिक विरासत को सहेजने में काफी बड़ा योगदान रहा है जोकि आज हमारे बीच नहीं हैं।
यह सारी जानकारियां साझा करते हुए युवा और संस्कृतिक विभाग के सांस्कृतिक कार्यक्रम पर्यवेक्षक हरविन्द्र राणा ने बताया कि उनका मुख्य लक्ष्य लोक संस्कृति को सहेजते हुए आधुनिकता की ओर बढ़ना है। इसी बात को अपनी प्रेरणा मानकर वे रत्नावली के लिए समर्पित भाव से अपना काम करते हैं।
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