विपक्ष को चुनाव में ध्रुवीकरण ही बचा सकता है
हरियाणा विधानसभा चुनाव को लेकर इन दिनों जो हवा चल रही है उससे साफ है कि मुकाबला बिलकुल एक तरफा है। मीडिया सर्वे तो इसी बात की ओर इशारा करते हैं। पिछले दस महीनों के घटनाक्रम ने हरियाणा की राजनीति के कई मायने बदल दिए हैं। इंडियन नेशनल लोकदल पार्टी (इनेलो) जोकि हरियाणा में मुख्य विपक्षी पार्टी थी वह टूटने और दल-बदल होने के बाद 19 से 3 विधायकों पर सिमट आई। इनेलो से टूटकर बानी जननायक जनता पार्टी (जेजेपी) भी हाल ही में हुए लोकसभा चुनाव में कुछ खास प्रदर्शन नहीं कर पाई। उसको महज इनेलो से विरासत में मिले वोटों से ही संतुष्ट होना पड़ा। ऐसे में इनेलो और जेजेपी ने अपने ही विरासत के वोटबैंक में सेंधमारी की और नुकसान दोनों को ही हुआ। विधानसभा चुनाव के दौरान दोनों पार्टियों के एक साथ आने की सम्भावना बनी थी पर वो भी मुमकिन नहीं हो पाया। चुनाव को जितना समय बाकि है , इतने समय में दोनों दलों के लिए एक नया वोटबैंक तैयार करना दूर की कोड़ी होगी। दूसरी तरफ हरियाणा कांग्रेस में प्रदेश अध्यक्ष बदलने और अशोक तंवर के इस्तीफे के बाद से पार्टी की अंधरूनी कलह सड़क पर आ गई है। इससे पार्टी की छवि और वोटबैंक दोनों पर गहरा असर पड़ेगा। हरियाणा कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष अशोक तंवर पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा देने के बाद कांग्रेस के कई बड़े नेताओं मुख्यतः हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुडडा पर तलख तेवर इख़्तियार किये हुए हैं। इसकी शुरुआत भी उन्होंने हुडडा का गढ़ कहे जाने वाले रोहतक जिले से कर दी है। हालांकि खुद तंवर कहीं से चुनाव नहीं लड़ रहें हैं मगर पार्टी के खिलाफ उनका बगावती तेवर पार्टी के वोटबैंक को जरूर नुकसान करेगा। वहीं अगर बात सत्ताधारी दल भाजपा की करी जाये तो उसने लोकसभा चुनाव खत्म होने के तुरंत बाद से एक्शन मोड में आकर कार्यकर्ता सम्मान में रैलियां कीं। उसके बाद 'मेरा पन्ना सबसे चौकन्ना' कैंपेन चलाया। फिर मुख्यमंत्री मनोहर लाल ने जन आशीर्वाद यात्रा निकली। यानि पार्टी द्वारा हर स्तर पर आम जन को यह संदेश देने की कोशिश की गई कि पार्टी संगठित है और चुनाव में वही सबसे मजबुत विकल्प है। लिहाजा भाजपा का वोटबैंक वैसा का वैसा है और अगर सरकार का काम अच्छा रहा तो वो और मजबुत होगा। टिकट बटवारे से नाराज नेताओं को लेकर भी पार्टी किसी तरह का जोखिम नहीं लेना चाहती। तभी तो चाहे जिस लालच से नाराज नेताओं को मनाया हो, मगर मनाया तो सही। अब तक आये रुझानों से तो भाजपा का रास्ता एकदम साफ लग रहा है। विपक्ष की पार्टियां किसी तरह अगर ध्रुवीकरण से दूसरे के वोटबैंक में सेंध करने में सफल हो जाती हैं तो शायद भाजपा को टक्कर दे पायें। ये ध्रुवीकरण ही है जो रजनीतिक हैसियत बचा सकता है।
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