ओमकार चौधरी द्वारा लिखित पुस्तक 'टेलीविज़न पत्रकारिता' पर एक समीक्षा
ओमकार चौधरी द्वारा लिखित पुस्तक 'टेलीविज़न पत्रकारिता' पड़ने का मौका मिला। ओमकार चौधरी जोकि खुद पेशे से पत्रकार रहे हैं। लेखक द्वारा रचित उपन्यास 'घेरा' सन 2001 में प्रकाशित हुआ जोकि काफी चर्चित उपन्यास है। श्री चौधरी जी को प्रभात, अमर उजाला और दैनिक जागरण जैसे प्रतिष्ठित समाचार-पत्रों में काम करने का अनुभव रहा है। हिंदी के मीडिया विद्यार्थिओं की जरुरत को समझते हुए उन्होंने इस पुस्तक का लेखन किया है।
वैसे तो लेखक का खुद का अनुभव प्रिंट पत्रकारिता का रहा है परंतु टेलीविजन पत्रकारिता पर लिखने का अनुभव उनको कैसे मिला ये तो लेखक खुद ही बता सकता है। श्री चौधरी जी ने अपनी पुस्तक में भारत में दूरदर्शन की शुरुआत का वर्णन करते हुए उन सभी कड़ियों का जिक्र किया है जिन्होंने भारत में टेलीविजन को लाने में सहयोग किया था। लेखक ने सेटेलाइट चैनलों के आगमन को विस्तार से बताया है। टेलीविजन के प्रभाव का वर्णन करते हुए लेखक कहता है कि जनमानस और राजनीति पर टेलीविजन का सकारात्मक और नकारात्मक दोनों तरह का प्रभाव पड़ा है। लेखक का मानना है कि लोगों पर टीवी में दिखाये जाने वाले सीधे प्रसारण का सबसे ज्यादा प्रभाव पड़ता है। और इस तरह के प्रभाव को लेखक ने टीवी की 'मायावी दुनिया' कहा है। टेलीविजन जैसे दृश्य माध्यम के तकनीकी पक्ष को भी लेखक ने उजागर किया है। नई नई तकनीक कैसे टेलीविजन जैसे माध्यम को प्रभावित कर रही हैं, लेखक विस्तार से इनके बारे में बताता है। लेखक कहता है कि आने वाले समय में टीवी पत्रकारिता को बाजारवाद सबसे ज्यादा प्रभावित करेगा, जोकि एकदम सही प्रतीत होता है।
पुस्तक में अगर कमियों की बात की जाये तो लेखक अगर आधुनिक तथ्यों को भी पुस्तक में जगह देता तो पुस्तक और अच्छी हो सकती थी। लेखक को प्रिंट का अधिक अनुभव रहा है पर टेलीविजन पर लिखने का अनुभव उनको कहाँ से मिला ये समझ से परे है। खैर, हिन्दी माध्यम में मीडिया की पढ़ाई कर रहे छात्रों के लिए यह पुस्तक काफी ज्ञानवर्धक है।
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