बुजुर्गों की विरासत को समेटे शेरसिंह की कहानी
34वीं रत्नावली में पहली बार आये शिल्पकार प्रजापति शेर सिंह की कहानी कम दिलचस्प नहीं है। अपनी 7 पीढियों से एक ही पेशे से जुड़े हुए शेरसिंह बताते हैं कि शहर के लोगों की बजाय गाँव के लोग मिट्टी के बर्तनों का ज्यादा प्रयोग करते हैं, जिनमें मटका, कढोंणी, कापण, कुज्जा, लोट आदि बहुत सारे बर्तन मिट्टी से बनाए जाते हैं। इनसे शिल्पकार का रोजमर्रा का खर्चा चलता है। अपनी विशेष क्षमता का जिक्र करते हुए बताया कि वे 2500 चूल्हे एक दिन में तैयार कर लेते हैं। एक दिन में 20 मटके तैयार करने की भी महारत उनको हाशिल है। उन्होंने बताया कि वे पीढ़ी दर पीढ़ी इस कार्य से कई सालों से जुड़े हुए हैं। लेकिन आजकल अपनी आजीविका का संकट उनके सामने खड़ा हो गया है। गांव में बढ़ते शहरीकरण ने उनके बने उत्पादों की बिक्री को काफी हद तक कम कर दिया है। जैसे-तैसे करके गुजारा जाता है।
हालांकि उन्हें पहली बार रत्नावली में आकर बेहद खुशी हो रही है। यहाँ उनकी शिल्पकला के प्रति लोगों के आकर्षण और प्यार को देखकर वह काफी खुश हैं। इसी वजह से शेरसिंह जी का कहना है कि वह आने वाली हर रत्नावली में अपनी शिल्पकला के नमुने पेश करते रहेंगे। अपने बुजुर्गों से मिली इस विरासत को वह अपनी भावी पीढ़ियों को भी पहुंचाने का काम करेंगे।
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